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Thursday, 30 April 2015

Chakrvarti samrat Ashok _ Kumari Parwati yadav(DSVV)

                 स्वकथन

      जीवन की सच्चाई को प्रकट करने वाले विद्वानों के यह कथन  ‘‘जीवन एक संघर्ष है’’ की प्रत्यक्ष अनुभूति मुझे तभी प्राप्त हो सकी जब मैंने अभिभावकत्व के स्नेहिल छाया से निकलकर बाहर की दुनिया में कदम रखा। साथ ही यह भी बोध हुआ कि द्वन्द्व भरा संघर्षों का मार्ग ही ऊँचे सोपानों तक पहुंचाता है।
इस सुअवसर को पूर्णता तक पहुंचाने तथा सार्थकता प्रदान करने में मेरा पुरुषार्थ तो एक निमित्त मात्र है। सही अर्थाें में इसका श्रेय उन लोगों को जाता है। जिनके आशीर्वाद, प्रेरणा, प्रोत्साहन व आत्मीयतापूर्ण व्यवहार तथा कुशल मार्गदर्शन के अभाव में इस परियोजना कार्य के पूरे होने की कल्पना भी करना दुष्कर है। मेरे सभी सहयोगियों के प्रति कृतज्ञता का भाव अभिव्यक्त करती हूँ।
सर्वप्रथम पूज्यवर माताजी को हृदय से धन्यवाद करती हूँ। अगले क्रम में हम अपने शोध प्रबंध परियोजना कार्य के निर्देशक डाॅ0 मोना का हृदय से धन्यवाद करती हूँ, जिन्होंने हमको उचित मार्गदर्शन प्रदान किया। जिनकी सहायता से यह परियोजना कार्य संपन्न हो सका। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से मेरे सभी सहयोगी जनों व इष्टमित्रों के प्रति हम हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ।
अंत में मैं पुनः अपनी आराध्य सत्ता का स्मरण करते हुए यह परियोजना कार्य उनके श्री चरणों में समर्पित करती हूँ।

दिनांक - 29/4/2015                                        कु0 पार्वती यादव

                                                  (बी0ए0 तृतीय वर्ष)


                                 प्रस्तावना

          भारत के इतिहास में मौर्य साम्राज्य का महत्व बहुत अधिक है। ऐतिहासिक विन्सेण्ट ए0 स्मिथ ने इस साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्य विस्तार का वर्णन करते हुए लिखा है कि ‘‘2000 साल से भी अधिक हुए, भारत के प्रथम सम्राट ने उस वैज्ञानिक सीमा को प्राप्त कर लिया जिसके लिए उसके ब्रिटिश उत्तराधिकारी व्यर्थ में आहें भरते रहें और जिसे 16 वीं तथा 17 वीं सदियों के मुगल साम्राटों ने भी कभी पूर्णता के साथ प्राप्त नहीं किया।’’ हिमालय से समुद्र पर्यन्त सहस्र योजन विस्तीर्ण जो पृथ्वी (भारत देश) है, वह एक चक्रवर्ती सामा्रज्य का क्षेत्र है। यह विचार आचार्य चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में प्रतिपादित किया था और मौर्यों ने इसे क्रियान्वित करने में सफलता प्राप्त की थी। शस्त्र शक्ति और दण्ड नीति के प्रयोग से प्रायः सम्पूर्ण भारत में एक सामा्रज्य की स्थापना कर मौर्य वंश के राजाओं ने अपनी असाधारण शक्ति का उपयोग धर्म द्वारा विश्व की विजय के लिए किया। महान् सम्राटों में चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र राजा अशोक ने देश- देशांतर में भारतीय सभ्यता, संस्कृति और धर्म के प्रचार के लिए जो उ़द्योग किया विश्व के इतिहास में वह वस्तुतः अनुपम है। मौर्य युग को भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग मानना सर्वथा समुचित और युक्ति संगत है।
मौर्य साम्राज्य के चक्रवर्ती समा्रट के रूप में अशोक के गौरवपूर्ण इतिहास को क्रमबद्ध एवं विशद् रूप से लिखने का प्रयत्न मैंने इस प्रयोजना कार्य के रूप में एक तुच्छ प्रयास किया है। - म‘ौर्य साम्राज्य का इतिहास’ डाॅ0 विद्यालंकार का प्रथम ग्रंथ तथा ऐसा ही विभिन्न ग्रंथों का अध्ययन कर मैंने अपना यह परियोजना कार्य लिखने का प्र्रयास किया है। मुझे खेद है कि मौर्य वंश के अधिक विद्वानेां को न पढ़ सकी। भविष्य मंे यदि अवसर मिला तो मैं अन्य विद्वानों को भी पढ़कर उनके विचारों का उल्लेख करने का प्रयास अवश्य करूंगी।
इससे यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि जब इस विषय पर अनेक ग्रंथ पहले से ही विद्यमान है तो एक नई परियोजना कार्य की आवश्यकता क्यों हुई?
अशोक के अद्वितीय व्यक्तित्व और कृतित्व की व्याख्या में अनेक ग्रंथ लिखे गये हैं। व्याख्या का आधार ही बदलता, बढ़ता और सुधरता रहा है। अशोक अपनी कहानी स्वयं कहता है उसके लेख पत्थरों पर खुदकर अमिट हो चुके हैं किन्तु इन लेखों का पता एकाएक ही नहीं लगा था। विभिन्न स्थानों और समयों में उसके लेख स्फुट रूप में मिलते रहे हैं। ये लेख अशोक के समय में उन स्थानांे पर खुदवाये गये होंगे। जहां पर घनी बस्तियां थीं। किन्तु अब वहां उजाड़ बियावन जंगल है। जहां इक्के- दुक्के ही कोई आदमी पहुंचता है।
अशोक संबंधी ज्ञान अब एक सौ वर्षों से भी अधिक पुराना हो चुका है। इस काल में इसके लेखों की खोज पाठ और व्याख्या इन तीनों दिशाओं में काफी प्रगति हुई है। इस  प्रगति की कुछ घटनाओं को मैंने अपने इस परियोजना कार्य के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।


दिनांक - 29/4/2015                                                                                        कु0 पार्वती यादव

                                            (बी0ए0 तृतीय वर्ष)


Thursday, 16 April 2015

MEANING AND DEFINATION OF YOGA

योग का अर्थ

योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के युज् धातु में घ´् प्रत्यय लगाके हुई है। जिसका सामान्य अर्थ होता है- जोड़ना। पाणिनि व्याकरण के अनुसार गण पाठ में तीन युज् धातु है-
 युज्-
1. युज् समाधौ (समाधि) दिवादिगणीय
2. युजिर् योगे (संयोग या जुड़ाव) रुधादिगणीय
3. युज् संयमने (संयम) चुरादिगणीय

1. समाधि - 

 युज् समाधौ से बना यह शब्द जिसका अर्थ है अपने वास्तविक रूप को जानकर उसमें निमग्न रहना।
        समाधि के विषय में आम लोगों की धारणा यही रहती है कि आदमी निष्क्रिय या मूच्र्छित हो जाता है। परन्तु समाधि प्राप्त योगियों के अनुसार समाधि वह विशेष स्थिति है जिसमें जीव सम्पूर्ण चैतन्य (जागरुक) होता है। वह भूत- भविष्य सब जानने की स्थिति में होता है। वह सभी कार्य प्रकृति के नियमों के अनुसार करता है। उसका विशेष गुण यह होता है कि वह सभी को आत्मोन्नति के लिये प्रेरित करता है। उसके सत्, चित्, आनन्द (प्रसन्नता) को कोई भी किसी भी स्थिति में छीन नहीं सकता । तथा वह सबके प्रति आत्मवत् सर्वभूतेषु का भाव रखता है।

2. संयोग या जुड़ाव -  

 युजिर् योगे से बना यह शब्द जिसका अर्थ होता है - एकत्व, जुड़ाव, संयोग, मेल या जोड़ना। इसी अर्थ को कई योगियों ने प्रमाणित नहीं माना है। उनका मानना है कि आत्मा परमात्मा का अंश है। तो इसमें दोनों को अलग करना संभव नहीं है।
     परन्तु  वहीं कई योगियों का मानना है कि जीव और  ब्रह्म के बीच कोई आवरण होता है उसे क्षीण करके हर जीवात्मा परमात्मा से जुड़ सकता है। जैसे- समुद्र का जल एक घड़े में तथा समुद्र का जल दोनों पानी का समान गण है परन्तु दोनों के मिलन के बीच घड़े का आवरण है। इसी प्रकार आत्मा के ऊपर विभिन्न प्रकार के संस्कारजन्य चित्त  वृत्तियों का आवरण परमात्मा के मिलन में बाधा है जिसे नष्ट करके आत्मा एवं परमात्मा जुड़कर एक हो सकते हैं।

3. संयम -  

 योग शब्द ‘युज् संयमने’ शब्द से बना है जिसका अर्थ है - संयम या वशीकरण। हठयोगियों के अनुसार अपने शरीर पर कठोरतापूर्वक संयम करके अपने मन पर संयम करना संभव है। परन्तु राजयोगियों के अनुसार शरीर को बिना कष्ट पहुँचाये मन को नियंत्रित करना है। मन को छोेटे- छोटे संकल्पों का पालन कर उसे नियंत्रित किया जा सकता है। युगऋषि के पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार संयम के चार प्रकार हैं-
 इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम एवं विचार संयम। इसी योग का उत्कृष्ट उदाहरण है।

परिभाषा -

  1.  महर्षि पतंजलि के अनुसार -‘‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’’ (पतंजलि.यो.सू. 1/2)

अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।

2. गीता के अनुसार - 

‘‘योगः कर्मसु कौशलम्’’  (गीता 2/50)

अर्थात् कर्म करने की कुशलता ही योग है।

‘‘समत्वं योग उच्यते’’ (गीता 2/48)

अर्थात् सुख- दुःख, हानि- लाभ, सफलता- असफलता आदि द्वन्द्वों में सम रहते हुए निष्काम भाव से कर्म करना ही योग है।

‘‘दुःख संयोगवियोगं योग संज्ञितम्’’ (गीता 6/23)

अर्थात् जो दुःख रूप संसार के संयोग से रहित है उसका नाम योग है।

3. महोपनिषद् के अनुसार -‘‘मनः प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते’’  (महो0 5/42) अर्थात् मन के प्रशमन के उपाय को योग कहते हैं।


4. महर्षि याज्ञवल्क्य के अनुसार- ‘‘संयोग योगयुक्तो इति युक्तो जीवात्मा परमात्मनो।’’

अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा के मिलन को ही योग कहते हैं।

5. कैवल्योपनिषद् के अनुसार- ‘‘श्रद्धा भक्ति ध्यान योगादवेहि’’ 

अर्थात् श्रद्धा, भक्ति, ध्यान के द्वारा आत्मा का ज्ञान ही योग है।

6. विष्णुपुराण के अनुसार- ‘‘योगः संयोग इत्यक्तः जीवात्मा परमात्मनो।’’

अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतः मिलन ही योग है।

7. योगशिखोपनिषद् के अनु0-  ‘‘योग प्राणपानयोरैक्यं स्वर जोरेत अस्तथा।’’ 

                                                  सूर्य चन्द्रमसो योग जीवात्मा परमात्मनः।।’’

अर्थात् प्राण- अपान को रज, वीर्य को सूर्य एवं चन्द्रमा को तेजस्विता एवं शीतलता को, जीवात्मा एवं परमात्मा को मिलाना ही योग है।

8. सांख्य दर्शन के अनु0- ‘‘युं प्रकृत्यो वियोगेऽपि योग इत्यभिधीयते।’’ 

अर्थात् पुरुष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरुष का स्व के शुद्ध रूप में अवस्थित होना ही योग है।
9. लिंग पुराण के अनु0- चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध हो जाना व उसे पूर्णतः समाप्त कर देना ही योग है।

10. श्रीरामकृष्ण परमहंस के अनु0- परमात्मा की शाश्वत अखण्ड ज्योति के साथ अपनी ज्योति को मिला देना ही योग है।

11. युग ऋषि के अनु0- 

  जीवन साधना ही योग है। चित्त की चेष्टाओं को बहिर्मुखी बनने से रोककर उन्हें अंतर्मुखी करना तथा आध्यात्मिक चिंतन में लगाना ही योग है।
  अभाव को भाव से, अपूर्णता को पूर्णता से मिलाने की विद्या योग कही गई है।

12. स्वामी विवेकानंद के अनु0- 

योग व्यक्ति के विकास को उसकी शारीरिक सत्ता के एक जीवन या कुछ घण्टों में संक्षिप्त कर देने का साधन है। 

13. स्वामी दयानंद के अनुसार-     सजगता का विज्ञान योग है। 

14. विनोबा भावे के अनुसार - 

जीवन के सिद्धान्तों को व्यवहार में लाने की जो कला या युक्ति है उसी को योग कहते हैं।

15. महर्षि वशिष्ठ के अनु0-     संसार सागर से पार होने की युक्ति योग है। 

16. महर्षि अरविंद के अनु0-   अपने आप से जुड़ना ही योग है। 

17. योगशास्त्र के अनु0-

 ‘‘सर्वचिन्ता परित्यागो निश्चिन्तो योग उच्यते।’’ अर्थात् मनुष्य जिस समय समस्त उद्विग्नताओं को त्यागकर देता है उस समय उसके मन की लयावस्था को योग कहते हैं। 

18. रांघेय राघव के अनु0- शिव एवं शक्ति का मिलन ही योग है। 

19. महादेसाई के अनु0-   शरीर, मन एवं आत्मा की सारी शक्तियों को परमात्मा में नियोजित करना ही योग है।  



Friday, 3 April 2015

SWAR SANDHI , अच् (स्वर) सन्धिः

अथ सन्धि प्रकरणम्  - 

दो वर्णों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे सन्धि कहते हैं।

अच् (स्वर) सन्धिः

दो स्वरों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे स्वर सन्धि कहते हैं। इसके निम्न प्रकार हैं - 

1. दीर्घ स्वर सन्धिः -  ‘‘अकः सवर्णे दीर्घः’’  - अर्थात् अक् प्रत्याहार के बाद में यदि कोई सवर्ण स्वर वर्ण हो तो पूर्व और पर दोनों के स्थान पर दीर्घ एकादेश होता है। जैसे- 

अ, आ + अ, आ = आ
इ, ई +इ, ई = ई
उ, ऊ + उ, ऊ = ऊ
ऋ, ऋृ + ऋ, ऋृ = ऋृ

उदाहरण -  राम + आलयः = रामालयः (अ+आ)
            दैत्य + अरिः = दैत्यारिः (अ+अ)
            विष्णु + उदयः = विष्णूदयः (उ+उ)
 श्री + ईशः = श्रीशः (इ+ई)
 होतृ + ऋकारः = होत¤कारः (ऋ+ऋ) आदि।

2. गुणस्वर सन्धिः -  ‘‘आद्गुणः’’ -  आत् (अवर्ण- अ, आ) से इक् (इ,उ,ऋ,लृ) परे होने पर पूर्व- पर के स्थान पर गुण एकादेश होता है। 


जैसे-  अ, आ + इ, ई = ए
       अ, आ + उ, ऊ = ओ
       अ, आ + ऋ, ऋृ = अर्
       अ, आ + लृ = अल्
नोटः- गुण तीन प्रकार के होते हैं-
‘‘अदेङ्गुणः’’ -   अर्थात् अत् (अ), एङ् (ए, ओ) का नाम गुण है।जैसे-
गंगा + उदकम् = गंग् आ + उदकम् = गंग् ओ दकम् = गंगोदकम्
उप + इन्द्रः = उपेन्द्रः (अ + इ = ए)

3. वृद्धि सन्धिः - ‘‘वृद्धिरेचि’’ -  अवर्ण (अ, आ) से एच् (ए, ओ, ऐ, औ) परे होने पर पूर्व और पर के स्थान पर वृद्धि संज्ञक एकादेश होता है। 

वृद्धि =  अ, आ + ए, ऐ = ऐ
              अ, आ + ओ, औ = औ
जैसे - तथा +एव = तथैव
 एक + एकम् = एकैकम्
महा +औषधिः = महौषधिः
      शर्करा +ओदनः = शर्करौदनः
      राज + ऐश्वर्यम् = राजैश्वर्यम्

4. पररूप सन्धिः -  ‘‘एङिपररूपम्’’   -   अवर्णान्त (जिसके अन्त में ‘अ’ हो) उपसर्ग से एङ आदि (जिसके अन्त में ए और ओ हो) धातु के परे होने पर  पर और पूर्व के स्थान पर पररूप एकादेश होता है।  जैसे- 


प्र +एजते = प्रेजते
उप + एहि = उपेहि
प्र + ओषति = प्रोषति


5. पूर्वरूप सन्धिः -   ‘‘एङ्पदान्तादति’’    - पद के अन्त में यदि एङ् (ए, ओ) हो तो उनके बाद में यदि ह्रस्व अकार है तो पूर्व और पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश होता है। 

ए + अ = ए
ओ + अ = ओ
जैसे - हरे + अव = हरेऽव
       विष्णो + अव = विष्णोऽव
       नमो + अस्तु = नमोऽस्तु
       लोके + अस्मिन् = लोकेऽस्मिन्
     

6. अयादि सन्धिः -  ‘‘एचोऽयवायावः’’  -  एचः अय् अव् आय् आव् अर्थात् एच् (ए, ऐ, ओ, औ) के बाद यदि अच् हो तो एच् के स्थान पर अय्, आय्, अव्, आव् आदेश होता है। 

‘‘यथा संख्यः मनुदेशः समानाम्’’  -  बराबर संख्या वाली विधि क्रम से होती है।
ए = अय्
ओ = अव्
ऐ = आय्
औ = आव्

जैसे-  भो + अति = भ् ओ + अति = भ् अव् + अति = भवति
करौ + एतौ  = करावेतौ (औ + ए)
गै + अति = गायति(ऐ+अ)
मनो + ए = मनवे

7. यण् सन्धिः  -  ‘‘इकोयणचि’’   -  इक् (इ, उ, ऋ, लृ) के स्थान पर यण् (य्, व्, र्, ल्) आदेश होता है यदि ‘अच्’ परे हो तो। 


इ, ई + अच् हो  = य्
उ, ऊ +   अच् हो   = व्
ऋ, ऋृ +  अच् हो   = र्
लृ + अच् हो  = ल्
जैसे -  यदि + अपि = यद् इ अपि = यद् यपि = यद्यपि
     
        मनु + आदि = मन्वादि
        पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा

Thursday, 2 April 2015

SANSKRITAM

                   संस्कृत प्रथम सत्र- पाठ्यक्रम


विषयानुक्रमणिका -

1. संज्ञा प्रकरणम् :-माहेश्वरसूत्राणि  ,वर्णों का उच्चारण स्थान, यत्न विचार !

2. सन्धि प्रकरणम्: अच् सन्धि ,हल् (व्यंजन) सन्धिः,   

3. शब्दरूप सिद्धिः - सूत्र, शब्दरूप सिद्धि प्रक्रिया

4. शब्दरूप प्रकरणम् 

5.  लट् लकार, लृट् लकार, लोट् लकार, विधिलिंग्, लृङ् लकार